वो आँखे

टखनों पर रखे अपने सर को
रोकते अपने कापते हाथो को,
उस अँधेरे कमरे में
वो आँखे
देख रही है, प्रकाश की वो शिखा
जो जल रही है उस केरोसीन से
जो घर में अब नहीं है बचा।

वेदना तो भी दया आती नहीं ,
देखकर उसकी दशा।
जो जी रही है केवल
मृत्यु के इंतज़ार में।

वो आँखे
शांत है उतनी ही जितना
शांत है जीवन उसका,
चेहरे पर भाव उसके
धूमिल हो चुके है, ऐसे ही
धूमिल जैसे उसके जीवन की याद है.

वो आँखे
झपकती है निरंतर
पर झपकती हो शायद कभी ही
आँखों से पानी गिराने के लिए।

वो आँखे
सोचती है कुछ नहीं, कल के बारें में
व्यस्त रहती है वो सदा
आज मे.

वो आँखे
जो कभी मिली होंगी कुछ आँखों से,
और जो कभी
दिखाती होंगी मघुर सपने
भविष्य की कामनाओं के।

शायद वो आँखे व्यस्त है
खोजती उन्ही यादो को
जो खो गयी है स्मर्तियो में
भूत की मार से।
और ढकी है, चिन्ताओ के परदे से
वर्तमान की।

बचपन याद आता है

मुझे बचपन याद आता है।
सुबह सवेरे उठना और नहाना
मंदिर में जाना और जल चढाना।
पाठशाला का रास्ता,
किताबे और बस्ता।
मेले में गुब्बारे जलेबी पर मचलना,
नहाना नहर में और इमली पर चढ़ना।

खरबूजों का खेत अकसर सताता है।
मुझे बचपन याद आता है।

जुते खेतो में बिचरना,
फिसलकर मेड से गिरना,
भैय्या से झगड़ना, ओर
अपने कुत्ते से लड़ना।
मुझे अब भी हँसाता है।
मुझे बचपन याद आता है।

घड़ी भर का रूठना,
और फिर हस जाना
दादी के साथ ताश की बाज़ी
और मम्मी का मनाना

शहतूत के पेड़ की टहनी
क्रिकेट का बल्ला
गिनती और पहाड़े
स्कूल का हो हल्ला

मासूम सा चेहरा, अभी भी भाता है
मुझे बचपन याद आता है।

ब्लैक-बोर्ड

खिड़की से वाहर देखा,
नजरे दूर तक जाती है।
और छितिज पर टिक जाती है।
वहा शून्यता का आभाष होता है।
और वापस मैं देख लेता हूं,
वही ब्लैक-बोर्ड क्लास का।
जो रोज कुछ बताता है।
क्या है ? क्या ज्ञात है।
क्यों है , क्या अज्ञात है।
— जनबरी २०, २००६